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अंतकाल में भगवान का स्मरण — नर्क से बचने का उपाय नहीं, चेतना के जागरण का द्वार

अंतकाल में भगवान का स्मरण — नर्क से बचने का उपाय नहीं, चेतना के जागरण का द्वार

अंतकाल-में-भगवान-का-स्मरण

अंतकाल में भगवान का स्मरण

सनातन दर्शन को केवल बाहरी धार्मिक नियमों और दंड की व्यवस्था के रूप में देखने पर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—यदि जीवनभर मनुष्य पाप करता रहे, दूसरों को दुःख देता रहे और मृत्यु के समय भगवान का नाम ले ले, तो क्या उसके सारे कर्म समाप्त हो जाएंगे? क्या केवल अंतिम क्षण का राम-नाम जीवनभर के कर्मों का हिसाब मिटा सकता है? यदि ऐसा होता, तो कर्म और उसके फल का सिद्धांत ही निरर्थक हो जाता। इसलिए भगवान का अंतिम स्मरण किसी “कॉस्मिक लूपहोल” की तरह नहीं है, जिससे मनुष्य अपने कर्मों की जिम्मेदारी से बच जाए। सनातन की गहराई में जाएँ तो समझ आता है कि यहाँ नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि चेतना का द्वार है।

वेदांत में पाप को केवल किसी बाहरी अपराध की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि ऐसे कर्म के रूप में समझा जा सकता है जो चेतना को उसके सत्य स्वरूप से दूर ले जाता है और भीतर अशांति, आसक्ति, भय, द्वेष, अहंकार तथा वासनाओं के संस्कारों को मजबूत करता है। मनुष्य जैसा सोचता है, जैसा करता है और जिस भावना को बार-बार पोषित करता है, वैसी ही उसकी आंतरिक प्रवृत्ति बनती जाती है। कर्म संस्कारों को गहरा करते हैं, संस्कार वासनाओं को जन्म देते हैं और वासनाएँ फिर नए कर्मों को प्रेरित करती हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने ही भीतर एक ऐसा चक्र निर्मित कर सकता है जिसमें वह इच्छा, आसक्ति, कर्म और उसके परिणामों के बीच घूमता रहता है।

इसी दृष्टि से “नर्क” को केवल किसी दूर स्थित भौतिक स्थान के रूप में समझना आवश्यक नहीं। शास्त्रीय वर्णनों में नर्क के अनेक प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक अर्थ भी देखे जा सकते हैं। जिस चेतना में तीव्र वासनाएँ हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने का साधन नहीं; जिसमें अपराध-बोध है, लेकिन उससे मुक्ति का मार्ग नहीं; जिसमें क्रोध है, लेकिन उसे व्यक्त करने का शरीर नहीं; जिसमें लालसा है, लेकिन उसे तृप्त करने के साधन नहीं—वह चेतना स्वयं अपने भीतर पीड़ा का संसार बना सकती है। इस अर्थ में नर्क किसी बाहरी जेल से अधिक अशांत और बंधी हुई चेतना की अवस्था का प्रतीक बन जाता है।

लेकिन यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—कर्मफल और नर्क एक ही बात नहीं हैं। कर्म का सिद्धांत यह नहीं कहता कि कोई व्यक्ति मृत्यु के क्षण भगवान का नाम लेकर अपने सभी कर्मों को जादुई ढंग से मिटा सकता है। बल्कि प्रश्न यह है कि उस अंतिम क्षण में उसकी चेतना वास्तव में कहाँ स्थित है। जीवनभर जिसने अहंकार, हिंसा, लोभ, आसक्ति और वासना को अपना आधार बनाया है, उसके लिए मृत्युशय्या पर केवल शब्दों से भगवान का नाम लेना और वास्तव में ईश्वर में समर्पित हो जाना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

इसीलिए श्रीकृष्ण का वचन—“अन्तकाले च मामेव स्मरन्”—अत्यंत गहरा है। अंतकाल में मेरा स्मरण करते हुए मुझे प्राप्त होता है—इसका रहस्य केवल मृत्यु के अंतिम कुछ सेकंड में उच्चारित किए गए शब्दों में नहीं, बल्कि उस चेतना की दिशा में है जो पूरे जीवन में निर्मित हुई है। अंतिम क्षण अचानक कोई नई चेतना पैदा नहीं करता; वह प्रायः उसी दिशा को प्रकट करता है जिसमें मनुष्य जीवनभर चलता रहा है। जिस मन ने बार-बार संसार में अपना केंद्र बनाया है, वह अंत में भी उसी ओर भागेगा; और जिस चेतना ने धीरे-धीरे अपने कर्तापन, आसक्ति और अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना सीखा है, उसके लिए अंतिम स्मरण जीवन की साधना का स्वाभाविक फल बन सकता है।

इसलिए भगवान का नाम नर्क से बचने का टिकट नहीं है। नाम उस “मैं” को देखने का माध्यम है जिसने अपने लिए सुख-दुःख, भय, वासना, अपेक्षा और संघर्ष का संसार बनाया है। जब “मैं करता हूँ”, “मैं भोगता हूँ”, “मुझे चाहिए”, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ”—यह कर्ताभाव धीरे-धीरे ढीला पड़ता है और उसके स्थान पर समर्पण जन्म लेता है, तब नाम केवल जिह्वा पर नहीं रहता; वह चेतना में उतरने लगता है। तब राम केवल दो अक्षर नहीं रहते, बल्कि भीतर उस मौन की ओर संकेत बन जाते हैं जहाँ अहंकार की पकड़ कमजोर पड़ती है।

यही कारण है कि नाम-स्मरण का वास्तविक अर्थ जीवन के अंतिम क्षण की तैयारी से कहीं अधिक है। यदि मृत्यु के समय भगवान को याद करना है, तो भगवान को जीवन में भी याद करना होगा। यदि अंतिम क्षण में समर्पण चाहिए, तो आज ही अपने भीतर समर्पण का अभ्यास करना होगा। यदि अंतिम समय में अहंकार छूटना है, तो आज ही “मैं” को थोड़ा-थोड़ा छोड़ना होगा। मृत्यु के क्षण का स्मरण वास्तव में पूरे जीवन की साधना का दर्पण है।

और शायद यही वह स्थान है जहाँ न्याय और करुणा एक-दूसरे से मिलते हैं। कर्म का नियम मनुष्य को उसके कर्मों की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता, लेकिन ईश्वर-स्मरण उसे अपनी चेतना को बदलने का मार्ग देता है। पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त, सेवा, प्रेम, सत्य, साधना और समर्पण—ये सब उसी परिवर्तन के रास्ते हैं। इसलिए किसी पापी को यह कह देना कि “अंत में भगवान का नाम ले लेना, सब माफ हो जाएगा” सनातन के कर्म-सिद्धांत को अत्यंत सतही बना देना है। लेकिन यह कहना भी अधूरा होगा कि मनुष्य अपने अतीत से कभी मुक्त नहीं हो सकता। सनातन का संदेश इससे कहीं अधिक गहरा है—कर्म का सामना करो, संस्कारों को पहचानो, भीतर परिवर्तन लाओ और चेतना को उसके मूल की ओर लौटाओ।

अंततः भगवान का नाम ईश्वर को मनाने के लिए नहीं है; नाम हमें अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए है। ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं जिसे हमारी प्रशंसा की आवश्यकता हो। नाम स्मरण करते-करते जब साधक उस स्थान पर पहुँचता है जहाँ नाम लेने वाला, नाम और जिसका नाम लिया जा रहा है—इन तीनों का भेद धीरे-धीरे शांत होने लगता है, तब नाम एक शब्द से आगे बढ़कर चेतना का द्वार बन जाता है।

इसलिए “अंतकाले च मामेव स्मरन्” का सबसे सुंदर रहस्य शायद यह है—मृत्यु के समय भगवान को याद करने की तैयारी मृत्यु के समय नहीं, जीवन के प्रत्येक क्षण में होती है। जिस चेतना ने जीवनभर स्वयं को संसार में खोजा, उसे अंत में भी संसार ही दिखाई देगा; और जिसने जीवनभर अपने भीतर उस परम सत्य को खोजा, उसके लिए मृत्यु अंत नहीं, उसी सत्य में लौटने का द्वार बन सकती है। तब भगवान का नाम नर्क से भागने का उपाय नहीं रहता—वह उस चेतना के जागरण का नाम बन जाता है, जिसने नर्क और स्वर्ग दोनों के पार अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया है।