Founder’s Spiritual Journey
OUR FOUNDER
Swami Jagteshwar Anand Ji
Spiritual Guru • Consciousness Mentor • Sadhana & Meditation Guide • Reiki & Energy Healer • Counsellor • Trainer
स्वामी जगतेश्वर आनंद जी
एक खोज • एक साधना • अनेक अनुभव • सेवा की यात्रा • चेतना की ओर निरंतर बढ़ता कदम
“चेतना को जानने की यात्रा — स्वयं से परम चेतना तक”
एक साधक की यात्रा
हर आध्यात्मिक यात्रा बाहर से देखने पर एक कहानी लग सकती है, लेकिन साधक के भीतर वह प्रश्नों, संघर्षों, अनुभवों और परिवर्तन की एक लंबी यात्रा होती है। मेरी यात्रा भी किसी निश्चित योजना के साथ शुरू नहीं हुई थी। यह एक ऐसी खोज थी जिसमें कभी प्रश्न आगे थे, कभी अनुभव, कभी मौन और कभी स्वयं जीवन ही मार्गदर्शक बन गया।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि जीवन की अनेक घटनाएँ अलग-अलग नहीं थीं। वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई कड़ियाँ थीं, जिन्होंने धीरे-धीरे मुझे पूजा से साधना, साधना से ऊर्जा, ऊर्जा से चेतना और चेतना से आत्म-अन्वेषण की ओर बढ़ाया।
यह मेरी व्यक्तिगत आध्यात्मिक यात्रा है—मेरे अनुभवों, मेरी साधना और मेरी समझ की यात्रा। इसे किसी सार्वभौमिक सत्य के रूप में नहीं, बल्कि एक साधक की अंतःयात्रा के रूप में समझना चाहिए।
उपचार से खोज तक • खोज से साधना तक • साधना से अनुभव तक • अनुभव से सेवा तक • सेवा से चेतना तक • चेतना से आत्मबोध तक “बाहरी संसार को बदलने से पहले मनुष्य को अपने भीतर के संसार को जानना होगा।”
एक ऐसी यात्रा जिसमें प्रश्न होते हैं, खोज होती है, साधना होती है, अनुभव होते हैं—कभी प्रकाश मिलता है तो कभी भीतर के अंधकार से सामना होता है। स्वामी जगतेश्वर आनंद जी की आध्यात्मिक यात्रा केवल किसी एक पूजा-पद्धति, किसी एक साधना या किसी एक विचार या सिद्धांत तक सीमित नहीं है।
यह यात्रा है—
शरीर से मन तक • मन से ऊर्जा तक • ऊर्जा से चेतना तक • चेतना से परम सत्य की खोज तक।
इसी खोज ने समय के साथ उपचार, योग, ध्यान, ऊर्जा-अनुभव, मंत्र, साधना, चक्र, कुण्डलिनी, आध्यात्मिक अभ्यास और आत्म-अन्वेषण जैसे अनेक आयामों को एक व्यापक यात्रा में जोड़ने का मार्ग बनाया।
Founder’s Spiritual Journey- जन्म और बचपन जहाँ से यात्रा ने अपना पहला रूप लिया
इस शरीर का जन्म विक्रम संवत् 2031, 14 अप्रैल 1974 को उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के ग्राम पुसगवां में हुआ। कागजी अभिलेखों में जन्मतिथि 1 जनवरी 1976 मानी गई। पिता बाबू राम और माता ॐवती थीं।
बचपन का अधिकांश समय गाज़ियाबाद में बीता। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण हाई स्कूल के बाद औपचारिक शिक्षा आगे नहीं बढ़ सकी और जीवन-यापन के लिए विभिन्न कार्य करने पड़े।
लेकिन जीवन की बाहरी परिस्थितियों के बीच भीतर कहीं आध्यात्मिकता के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण बना रहा।
बचपन से ही जब कोई इच्छा या समस्या सामने आती, तो मैं माँ के मंदिर जाकर प्रार्थना करता। कई बार परिस्थितियाँ सहज रूप से बदल जातीं और मेरी बाल-बुद्धि के लिए यह समझना कठिन था कि ऐसा कैसे हो रहा है।
शायद इन्हीं अनुभवों ने भीतर एक अनकहा विश्वास जन्म दिया—
“दिखाई देने वाली दुनिया से परे भी कुछ है।”
और यही भाव आगे चलकर मेरी खोज का आधार बना।
“आखिर वह शक्ति क्या है जिसे मनुष्य महसूस तो करता है, लेकिन जानता नहीं?”
मेरे भीतर शक्ति कहाँ है?
मेरे भीतर भय कहाँ से आता है?
मेरे भीतर असंतुलन क्यों है?
मेरे भीतर कौन-सी चेतना सोई हुई है?
और मैं अपने वास्तविक स्वरूप को कैसे पहचानूँ?
1994 : आध्यात्मिक खोज की शुरुआत-उत्तर की तलाश में भटकता एक मन
लगभग 1994 से मेरे भीतर एक गहरी खोज शुरू हुई।
मैं जानना चाहता था कि जीवन का वास्तविक आधार क्या है? आध्यात्मिक शक्ति क्या है? साधना क्या है? और वह अनुभव क्या है जिसकी चर्चा संतों और साधकों के माध्यम से होती रही है?
मैं अलग-अलग संतों, भक्तों और साधना परंपराओं से जुड़ा। राधास्वामी, निरंकारी, देवरहा बाबा, जयगुरुदेव, आशाराम तथा अनेक संतों और तांत्रिक साधकों के संपर्क में आया।
मैं किसी एक मार्ग को आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
जो कुछ बताया जाता, भीतर से कोई आवाज़ उसे स्वीकार करने से रोक देती।
यह अस्वीकार अहंकार नहीं था; मेरे लिए यह उस समय एक बेचैनी थी—जब तक स्वयं अनुभव न हो, तब तक किसी बात को अंतिम सत्य कैसे मान लूँ?
इसी खोज के बीच 30 जून 1994 को मेरा विवाह हुआ। विवाह के बाद जीवन में अनेक समस्याएँ आईं और मेरी आध्यात्मिक खोज और अधिक तीव्र हो गई।
मैं समाधान खोजने के लिए अनेक लोगों के पास गया, लेकिन मन को वह उत्तर नहीं मिला जिसकी तलाश थी।
महामाया का बुलावा – 1994–1997 | जब खोज भीतर लौटने लगी
एक रात अचानक मेरी नींद खुली। भीतर विचार चल रहे थे कि तभी एक स्वर जैसा अनुभव हुआ—
“क्यों भटक रहा है? ठहर जा, सब कुछ है तेरे पास।”
मैं घबरा गया। समझ नहीं पाया कि यह स्वप्न था, मन की कोई अवस्था थी या कुछ और।
कुछ समय बाद वही स्वर फिर अनुभव हुआ—
“जो बचपन से तेरी सब इच्छाओं को पूरा करती है, उसको भूलकर क्यों सबके पास जा रहा है? 21 दिन उसकी सेवा कर, सब मिल जाएगा।”
इन शब्दों ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया।
मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। स्वयं भी निश्चित नहीं था कि इस अनुभव को कैसे समझूँ।
दो दिन तक यही विचार चलता रहा। फिर रविवार की शाम मैं दुर्गा माँ की तस्वीर, हिन्दी में श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक और रुद्राक्ष की माला लेकर आया।
अगले दिन से मैंने पूजा प्रारंभ कर दी।
मुझे कोई विशेष विधि ज्ञात नहीं थी। जैसा मन में आया, उसी भाव से पूजा और सेवा करता रहा।
धीरे-धीरे जिन परिस्थितियों ने मुझे परेशान कर रखा था, उनमें परिवर्तन आने लगा और लगभग 21 दिनों में जीवन सामान्य होने लगा।
इस अनुभव ने मेरे भीतर श्रद्धा को और गहरा किया।
लेकिन इसके साथ एक नया प्रश्न जन्मा—
“जिस शक्ति को हम श्रद्धा से पुकारते हैं, वह वास्तव में क्या है?”
यहीं से बाहरी खोज धीरे-धीरे अंतर-खोज में बदलने लगी।
जून–जुलाई 1997 – शुक्रताल और शक्तिपात का अनुभव
लगभग तीन वर्षों तक चलती रही खोज मुझे जून 1997 में शुक्रताल तक ले गई।
गंगा किनारे घूमते हुए मैं एक मंदिर की ओर गया। लौटते समय थकान और गर्मी के कारण घाट पर पत्थरों के ऊपर लेट गया।
उस समय क्या हुआ—मैं इसे आज भी उसी रूप में समझता हूँ जैसा मैंने अनुभव किया।
मुझे लगा जैसे मैं किसी जंगल में आगे बढ़ रहा हूँ।
आगे एक विशाल वटवृक्ष दिखाई दिया। उसके नीचे चार महात्मा हवन कर रहे थे। मैं उनके सामने बैठ गया। हवन चलता रहा और मैं भी उनके साथ आहुति देने लगा।
हवन के बाद उन्होंने मुझे एक फल दिया। वह फल मेरे लिए अत्यंत अद्भुत था—ऐसा फल मैंने उसके बाद कभी देखा नहीं और वैसा स्वाद भी फिर अनुभव नहीं हुआ।
इसके बाद वे चारों मुझे एक गुफा की ओर ले गए।
गुफा सुनसान थी, लेकिन उसके भीतर से प्रकाश निकल रहा था।
अंदर एक लंबी सफेद दाढ़ी वाले तपस्वी दिखाई दिए। वे आँखें बंद करके साधना में स्थित थे और उनके चारों ओर प्रकाश का अनुभव हो रहा था।
मैं उनके सामने हाथ जोड़कर बैठ गया।
तभी उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।
मेरे भीतर प्रकाश का अनुभव होने लगा। वह प्रकाश अनेक रंगों में बदलता गया। जिस रंग का प्रकाश अनुभव होता, मुझे लगता जैसे मैं उसी प्रकाश में परिवर्तित हो रहा हूँ।
अंत में सब कुछ स्वर्णिम प्रकाश में बदल गया।
उस समय मुझे इस अनुभव का अर्थ समझ नहीं आया।
बाद में अपनी साधना और समझ के आधार पर मैंने इसे शक्तिपात के अनुभव के रूप में समझा।
और फिर अचानक सब कुछ समाप्त हो गया।
जब आँख खुली तो सब सामान्य था।
लेकिन मेरी दुनिया सामान्य नहीं रह गई थी।
मेरे भीतर प्रश्नों की एक नई श्रृंखला शुरू हो चुकी थी।
साधना का गहराना – जब प्रश्न अनुभवों में बदलने लगे
शुक्रताल के अनुभव के बाद मुझे बार-बार उसी अवस्था में बैठने की इच्छा होने लगी।
मैं आँखें बंद करके बैठता। धीरे-धीरे ध्यान में आनंद अनुभव होने लगा और भीतर उठने वाले अनेक प्रश्नों के उत्तर स्वयं अनुभवों के रूप में सामने आने लगे।
साधना का समय बढ़ता गया।
लोग मुझे समझाने लगे कि अभी उम्र कम है, सामान्य जीवन जीना चाहिए। लेकिन मेरे भीतर कुछ और ही चल रहा था।
उस समय मेरी ज्वैलरी की दुकान भी थी। धीरे-धीरे दुकान पर ग्राहक कम और अपनी समस्याएँ लेकर आने वाले लोग अधिक दिखाई देने लगे।
लोग मुझे “भगत जी” कहने लगे।
मैं स्वयं भी यह समझने की कोशिश कर रहा था कि मेरे जीवन में क्या परिवर्तन हो रहा है।
इसी समय मेरी रुचि बाहरी दुनिया से हटकर ऊर्जा, चेतना और ब्रह्मांड के रहस्यों की ओर बढ़ती गई।
मेरी अंतर-यात्रा का एक नया चरण शुरू हो चुका था।
25 अगस्त 1997 – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महान आंतरिक अनुभव, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दिन।
उस समय मेरी साधना अत्यंत गहरी हो चुकी थी।
साधना के दौरान अचानक मुझे लगा कि शरीर का वजन समाप्त हो गया है। ऊपर की ओर उठने जैसा अनुभव हुआ और फिर एक तीव्र झटका लगा।
मुझे अनुभव हुआ कि मैं शरीर से अलग हो गया हूँ।
एक प्रकाश और ऊर्जा मुझे आगे की ओर ले जा रही थी।
आगे बढ़ते-बढ़ते ऐसा अनुभव हुआ कि मेरा सूक्ष्म शरीर भी केवल ऊर्जा के रूप में परिवर्तित हो गया है।
मैं सब कुछ देख और समझ रहा था—ऐसा मेरा अनुभव था।
फिर वह ऊर्जा एक ऐसी अनंत ऊर्जा में विलीन होती हुई प्रतीत हुई, जहाँ अनेक ऊर्जाएँ बिंदु रूप में तैर रही थीं।
उस अवस्था में जीवन, अंत और अस्तित्व को लेकर मेरे भीतर एक अलग प्रकार की समझ का अनुभव हुआ।
फिर अचानक भीतर से लौटने की इच्छा हुई।
मैंने अनुभव किया कि मैं पुनः सूक्ष्म शरीर में आया और फिर एक झटके के साथ स्थूल शरीर में लौट आया।
जब आँखें खुलीं तो रात के लगभग दस बज चुके थे।
मेरे अनुसार लगभग सात घंटे बीत चुके थे।
बाहर परिवार के लोग कह रहे थे कि उन्होंने कई बार आवाज लगाई थी, लेकिन मुझे उसका कोई बोध नहीं था।
मेरे लिए यह घटना केवल एक अनुभव नहीं थी।
यह मेरी खोज के भीतर एक गहरा मोड़ था।
जिसे बाहर खोज रहा था, उसकी खोज अब भीतर हो चुकी थी।
इसके बाद ऊर्जा और चेतना से जुड़े अनुभव और अधिक गहरे होते गए।
25 अगस्त 1997 – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महान आंतरिक अनुभव, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दिन।
उस समय मेरी साधना अत्यंत गहरी हो चुकी थी।
साधना के दौरान अचानक मुझे लगा कि शरीर का वजन समाप्त हो गया है। ऊपर की ओर उठने जैसा अनुभव हुआ और फिर एक तीव्र झटका लगा।
मुझे अनुभव हुआ कि मैं शरीर से अलग हो गया हूँ।
एक प्रकाश और ऊर्जा मुझे आगे की ओर ले जा रही थी।
आगे बढ़ते-बढ़ते ऐसा अनुभव हुआ कि मेरा सूक्ष्म शरीर भी केवल ऊर्जा के रूप में परिवर्तित हो गया है।
मैं सब कुछ देख और समझ रहा था—ऐसा मेरा अनुभव था।
फिर वह ऊर्जा एक ऐसी अनंत ऊर्जा में विलीन होती हुई प्रतीत हुई, जहाँ अनेक ऊर्जाएँ बिंदु रूप में तैर रही थीं।
उस अवस्था में जीवन, अंत और अस्तित्व को लेकर मेरे भीतर एक अलग प्रकार की समझ का अनुभव हुआ।
फिर अचानक भीतर से लौटने की इच्छा हुई।
मैंने अनुभव किया कि मैं पुनः सूक्ष्म शरीर में आया और फिर एक झटके के साथ स्थूल शरीर में लौट आया।
जब आँखें खुलीं तो रात के लगभग दस बज चुके थे।
मेरे अनुसार लगभग सात घंटे बीत चुके थे।
बाहर परिवार के लोग कह रहे थे कि उन्होंने कई बार आवाज लगाई थी, लेकिन मुझे उसका कोई बोध नहीं था।
मेरे लिए यह घटना केवल एक अनुभव नहीं थी।
यह मेरी खोज के भीतर एक गहरा मोड़ था।
जिसे बाहर खोज रहा था, उसकी खोज अब भीतर हो चुकी थी।
इसके बाद ऊर्जा और चेतना से जुड़े अनुभव और अधिक गहरे होते गए।
यह अनुभव आध्यात्मिक यात्रा में एक— महत्वपूर्ण आंतरिक मोड़
बन गया। इसके बाद साधना केवल किसी अनुभव को प्राप्त करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि चेतना, ऊर्जा और अपने अस्तित्व के वास्तविक स्वरूप को जानने की खोज और अधिक गहरी होती चली गई।
“जिसे खोजने निकले थे—उसकी खोज अब और गहरी हो चुकी थी।”
यह अनुभव भीतर नए प्रश्न लेकर आया—
क्या मनुष्य केवल यह शरीर है? क्या चेतना शरीर की सीमाओं से परे भी अपने अस्तित्व का अनुभव कर सकती है? और यदि चेतना का विस्तार अनंत तक संभव है, तो उस अनंत का वास्तविक स्वरूप क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर बाहर खोजने के बजाय उन्हें ध्यान, साधना और स्वयं के अनुभव में तलाशना प्रारंभ किया गया।
यह वर्णन स्वामी जी के व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित है। इसे किसी वैज्ञानिक तथ्य, चिकित्सकीय निष्कर्ष या सार्वभौमिक सत्य के दावे के रूप में नहीं, बल्कि उनकी निजी साधना-अनुभूति और आत्मिक यात्रा के एक अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
1998 : शक्ति से सेवा की ओर – वैराग्य, सीख और समाज की सेवा
साधना और अनुभवों के बीच 1998 में मेरे भीतर एक और बड़ा परिवर्तन आया।
साधना के दौरान एक प्रश्न भीतर उठा—
“क्या यही सब करने के लिए इतनी मेहनत की है? इसका उद्देश्य क्या है?”
इस प्रश्न ने मुझे भीतर से रोक दिया।
मैंने सोचा—
“मैं परमात्मा के कार्य में क्यों हस्तक्षेप करूँ? जिसे जो मिलना है, वह मिल रहा है।”
और मैंने लोगों से कहना शुरू किया—
“अब मैं कुछ नहीं करता।”
मैंने दाढ़ी बनवा दी और सामान्य जीवन जीने लगा।
लेकिन एक बात बदल चुकी थी—
लोगों की सेवा करने में मुझे आनंद मिलने लगा था।
यहीं से मेरी यात्रा ने एक नया रूप लिया।
मैं योग से जुड़ा। नैचुरोपैथी का अध्ययन किया। इसके बाद फिजियोथेरेपी, एक्यूप्रेशर और रेकी जैसी विधाओं से जुड़ा और उन्हें सीखा।
ऊर्जा से संबंधित अनेक विधाओं को समझना मेरे लिए सहज अनुभव हुआ।
धीरे-धीरे मैंने यह भी समझना शुरू किया कि आध्यात्मिक और ऊर्जा संबंधी विषयों के बारे में समाज में अनेक धारणाएँ, विश्वास और भ्रम मौजूद हैं।
मेरी रुचि अब केवल अनुभव करने में नहीं रही थी।
मैं समझना, सीखना और सेवा करना चाहता था।
2012 : कल्पान्त सेवाश्रम की नींव – साधना से सेवा की संस्थागत यात्रा
आध्यात्मिक अनुभवों के साथ-साथ सेवा का भाव भी लगातार बढ़ता गया।
12 मई 2012 को कल्पान्त सेवाश्रम की नींव रखी गई।
इस ट्रस्ट के माध्यम से मैं अपने स्तर पर विभिन्न सेवा कार्य करता रहा।
इसी कालखंड में कल्पान्त हीलिंग सेंटर एवं जगतेश्वर आनंद धाम भी अपनी पहचान बनाने लगा।
यह मेरे लिए केवल एक संस्था या स्थान का निर्माण नहीं था।
यह उस यात्रा का अगला चरण था जिसमें व्यक्तिगत साधना धीरे-धीरे सामूहिक सेवा और साधक-मार्गदर्शन की दिशा में बढ़ रही थी।
2015 : मृत्यु-समान अनुभव – जीवन के मूल्य का पुनः बोध
29 जनवरी 2015, दोपहर लगभग दो बजे।
मैं एक विवाह समारोह में था। मेरी पत्नी और दामाद पास ही खड़े थे। सब कुछ सामान्य था।
अचानक खड़े-खड़े मैं गिर पड़ा।
कुछ ही क्षणों के लिए ऐसी अवस्था हुई जिसे मैंने मृत्यु-समान अनुभव के रूप में महसूस किया।
फिर चेतना लौटी।
शरीर अत्यंत निस्तेज था और उठने के बाद भी उसमें सामान्य शक्ति का अनुभव नहीं हो रहा था।
उस घटना ने मेरे भीतर एक गहरा प्रश्न छोड़ा—
यदि जीवन इतना क्षणभंगुर है, तो इस जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
इसके बाद मैंने फिर से साधना सिखाना प्रारंभ किया।
लेकिन तब भी मेरा तरीका सीमित था। जो स्वयं मेरे पास आता और जिसे मैं साधना के लिए उपयुक्त समझता, उसी के साथ आगे बढ़ता।
मुझे लगता था कि अभी भी जीवन में कुछ कार्य बाकी है।
20 जुलाई 2018 : एक और मृत्यु-समान अनुभव – “अभी बहुत कुछ देना बाकी है”
20 जुलाई 2018 की रात मैं साधना में था।
अचानक शरीर गिर गया।
मेरे आसपास अनेक लोग एकत्र हुए। मेरा अनुभव था कि मैं चेतना में हूँ, जबकि शरीर नीचे पड़ा हुआ है।
उस अवस्था में मेरे भीतर एक ही भावना थी—
“अभी तो मैंने लोगों को देना शुरू किया है। अभी बहुत कुछ जाना है और बहुत कुछ लोगों तक पहुँचाना बाकी है।”
मैंने प्रार्थना की।
और मेरे अनुभव में एक स्वर आया—
“ठीक है, दस वर्ष तुमको और मिलते हैं।”
मेरे लिए यह घटना जीवन को देखने का एक और गहरा मोड़ बन गई।
मैंने इसे जीवन के प्रति एक नई जिम्मेदारी की तरह महसूस किया।
अब प्रश्न यह नहीं था कि “मुझे क्या मिलेगा?”
प्रश्न बदल चुका था—
“जो समझा है, उसे किस प्रकार साझा किया जाए?”
2018 के बाद – व्यक्तिगत साधना से साधकों की यात्रा तक
20 जुलाई 2018 के बाद मेरे जीवन की दिशा में एक स्पष्ट परिवर्तन महसूस हुआ।
अब मेरी खोज ऐसे साधकों की ओर होने लगी जो ध्यान, साधना और आत्म-अन्वेषण में आगे बढ़ना चाहते थे।
कुछ साधक जुड़े।
मैं उन्हें साधना कराने लगा।
इसी दौरान मेरे अपने अनुभव भी नई दिशाओं में खुलते गए। पूर्वजन्म, प्रकृति, परमात्मा और चेतना से जुड़े अनेक अनुभव मेरे सामने आने लगे—जिन्हें मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा के अनुभवों के रूप में देखता हूँ।
मुझे लगने लगा कि अभी यात्रा समाप्त नहीं हुई है।
जहाँ मुझे लगता था कि पहुँच गया हूँ, वहाँ से एक नया मार्ग दिखाई देने लगता था।
और इसी भावना ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
2019 : साधना का डिजिटल विस्तार – जब यात्रा स्क्रीन के माध्यम से साधकों तक पहुँची
मार्च 2019 में मैंने WhatsApp के माध्यम से कोर्स कराना शुरू किया।
धीरे-धीरे साधक जुड़ने लगे।
29 अगस्त 2019 को पहला Reiki Batch ऑनलाइन Zoom के माध्यम से शुरू हुआ।
इसके बाद ऑनलाइन साधना और प्रशिक्षण का विस्तार होता गया।
सोशल मीडिया—Facebook, WhatsApp और YouTube—साधकों तक पहुँचने का माध्यम बनने लगे।
मैंने अनेक विषयों पर लिखा, अपने अनुभव साझा किए और आध्यात्मिक रहस्यों को अपनी समझ के अनुसार व्यक्त करने का प्रयास किया।
जहाँ कुछ लोगों ने स्वीकार किया, वहीं कुछ ने विरोध भी किया।
लेकिन यात्रा चलती रही।
क्योंकि मेरा उद्देश्य किसी को मनाना नहीं था—
जो खोजने आया है, उसे खोज की दिशा देना था।
दिसंबर 2019 : साधकों का नया जुड़ाव – कल्पान्त मंडल की अनुभूति
8 दिसंबर 2019 को मीनू श्री से बातचीत हुई और Reiki सिखाने का आग्रह आया।
इसके बाद 21 दिसंबर को उनके साथ पहला Reiki Batch शुरू हुआ।
इस प्रक्रिया में मीना श्री और रेखा किशोरी जी के साथ संवाद और साधना का एक नया अध्याय खुला।
विशेष रूप से रेखा किशोरी जी द्वारा अनुभव की गई कुछ आंतरिक अनुभूतियों ने मेरे लिए साधकों के बीच एक नए प्रकार के संबंध और साधना-समूह की अनुभूति को जन्म दिया।
धीरे-धीरे अनेक साधक जुड़ते गए।
इन साधकों के समूह को “कल्पान्त मंडल” और आगे चलकर “कल्पान्त साधक मंडल” कहा गया।
मेरी अनुभूति के अनुसार यह केवल भौतिक रूप से जुड़े लोगों का समूह नहीं था, बल्कि साधना और चेतना की एक साझा यात्रा थी।
इस मंडल के माध्यम से साधना, अनुभव और संसारहित की भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास शुरू हुआ।
28 मार्च : कल्पान्त का नया रूप – एक नई पहचान का प्रगटीकरण
कल्पान्त सेवाश्रम की नींव 2012 में रखी जा चुकी थी।
समय के साथ कल्पान्त हीलिंग सेंटर एवं जगतेश्वर आनंद धाम का कार्य भी आगे बढ़ता रहा।
फिर 28 मार्च, पूर्णिमा के दिन एक नया रूप प्रकट हुआ—
श्रीं ऐश्वर्याम कल्पान्त हीलिंग सेंटर एवं जगतेश्वर आनंद धाम
मेरी आध्यात्मिक समझ में यह 2012 में रखी गई नींव के लगभग नौ वर्ष बाद सामने आए एक नए चरण जैसा था।
इसीलिए इस प्रगटीकरण को एक प्रतीकात्मक जन्म की तरह देखा गया—जैसे किसी नए जीवन को अपने पूर्ण रूप में आने में समय लगता है।
होलिका पूर्णिमा — प्रगटीकरण दिवस
और
31 मार्च — नामकरण उत्सव
इन तिथियों को मंडल के लिए विशेष रूप में देखा गया।
13 अप्रैल 2021 – दुर्गा सप्तशती का नया आध्यात्मिक प्रगटीकरण
13 अप्रैल 2021, नवरात्रि का आरंभ।
इस समय साधना का स्वरूप एक नए चरण में प्रवेश कर रहा था।
सामूहिक पूजा, ध्यान और देवी-शक्ति की साधना के बीच एक ऐसा अनुभव सामने आया जिसे मंडल ने दुर्गा सप्तशती के नए आध्यात्मिक प्रगटीकरण के रूप में ग्रहण किया।
यह अनुभव 13 अध्याय और 13 बीज मंत्रों के रूप में व्यक्त हुआ।
मेरी यात्रा में यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ व्यक्तिगत साधना की यात्रा एक सामूहिक आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दी।
इसे मैंने किसी अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं, बल्कि साधना की यात्रा में सामने आए एक और गहरे अनुभव की तरह देखा।
19 अप्रैल 2021 चैत्र मास • विक्रम संवत् 2078 • सोमवार • सप्तमी तिथि, सायंकाल — लगभग 5:00 से 7:00 बजे, साधना मंडल से जुड़े पाँच साधकों/दिव्य चेतना के माध्यमों की उपस्थिति में एक विशेष साधना संपन्न हुई।
स्वामी जी के आध्यात्मिक अनुभव के अनुसार, इस साधना में श्रीं ऐश्वर्यम कल्पान्त दुर्गासप्तशती के बीज मंत्रों को गुरु-प्रसाद के रूप में साधना मंडल से जुड़े साधकों को प्रदान किया गया। बीज मंत्रों का श्रवण, साधना और आंतरिक अनुभव कराया गया।
इसी साधना क्रम में—
नाभि-मंडल पर श्री यंत्र तथा नागराज के दर्शन का अनुभव भी वर्णित है और साधकों को—
महागुरु मंत्र से जोड़े जाने की साधना कराई गई।
इसके पश्चात—
21 अप्रैल 2021 — रामनवमी
रात्रि 10:10 बजे की पूजा एवं साधना के उपरांत, स्वामी जी के अनुसार “श्रीं ऐश्वर्यम कल्पान्त दुर्गासप्तशती” के आध्यात्मिक प्राकट्य को साधना मंडल से जुड़े दिव्य चेतना के माध्यमों के द्वारा व्यापक रूप से प्रसारित किए जाने का अनुभव हुआ।
इस प्रकार 13 अध्यायों और 13 बीज मंत्रों की यह साधना केवल एक पाठ या मंत्र-संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि— साधना • चेतना • गुरु-कृपा • आंतरिक अनुभूति
से जुड़े एक आध्यात्मिक प्रयोग एवं अनुभव के रूप में सामने आई।
एक नई साधना-दृष्टि 13 अध्याय • 13 बीज मंत्र • साधना • चेतना • गुरु-कृपा • आंतरिक अनुभव
आज भी यात्रा जारी है – अंत नहीं — एक निरंतर खोज
जब मैं अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे एक सीधी रेखा दिखाई नहीं देती।
मुझे दिखाई देती है—
एक खोज।, फिर—एक भटकाव।, फिर—श्रद्धा।, फिर—साधना।, फिर—अनुभव।, फिर—ऊर्जा।, फिर—वैराग्य।, फिर—सेवा।, फिर—साधकों का जुड़ना।, और फिर—चेतना की एक और गहरी खोज।
1994 की बेचैनी से लेकर 1997 के अनुभवों तक, 1998 की सेवा से 2012 के कल्पान्त सेवाश्रम तक, 2015 और 2018 के मृत्यु-समान अनुभवों से लेकर साधकों के साथ आगे बढ़ती यात्रा तक—हर चरण ने एक ही प्रश्न को और गहरा किया है:
मैं वास्तव में कौन हूँ?
क्या मैं केवल यह शरीर हूँ?
क्या मैं मन हूँ?
क्या मैं विचार हूँ?
या इन सबको देखने वाली कोई और चेतना भी है?
मेरी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।
मैंने जो पाया है, वह अंत नहीं है।
वह शायद अगले प्रश्न की शुरुआत है।
आज का संकल्प
आज मेरी साधना का केंद्र केवल किसी विशेष अनुभव को प्राप्त करना नहीं है।
मेरे लिए आध्यात्मिक यात्रा का अर्थ है—
स्वयं को जानना।
अपने भीतर उठते विचारों को देखना।
ऊर्जा और भावनाओं को समझना।
ध्यान में स्थिर होना।
अहंकार और भय को पहचानना।
जीवन को अधिक जागरूकता से जीना।
और जो समझ आया है, उसे साधकों के साथ साझा करना।
क्योंकि आध्यात्मिकता मेरे लिए केवल किसी स्थान, वेश, पूजा या विशेष अनुभव का नाम नहीं है।
यह जीवन को भीतर से देखने की कला है।
बाहर की दुनिया से भीतर की चेतना तक।
प्रश्न से अनुभव तक।
अनुभव से समझ तक।
समझ से साधना तक।
साधना से सेवा तक।
और अंततः—
“स्वयं से परम चेतना तक।”
एक अंतिम बात
यह यात्रा मेरी है।
मेरे अनुभव मेरे लिए सत्य-अनुभव रहे हैं, लेकिन प्रत्येक साधक की यात्रा अलग हो सकती है। किसी दूसरे व्यक्ति से वही अनुभव उसी रूप में हों, यह आवश्यक नहीं।
इसलिए मेरा उद्देश्य किसी अनुभव को मानने के लिए कहना नहीं, बल्कि प्रश्न करने, स्वयं को देखने, साधना करने और अपने अनुभव को स्वयं समझने की दिशा देना है।
मेरी यात्रा के बारे में अंतिम शब्द भी वही हैं जो इस यात्रा की भावना को सबसे अच्छी तरह व्यक्त करते हैं—
“यह मेरी अब तक की यात्रा है। आगे क्या होगा, यह सब परमात्मा की ही मर्जी पर निर्भर है।”
KALPANT DIVINE SCIENCE
ज्ञान से जागरण • साधना से अनुभव • अनुभव से समझ • सेवा से विस्तार • गुरु-कृपा से आत्मबोध
चेतना को जानने की यात्रा — स्वयं से परम चेतना तक
🔗 Founder → About
Kalpant Divine Science के उद्देश्य, कार्य और आध्यात्मिक दृष्टिकोण के बारे में अधिक जानने के लिए हमारा About Kalpant Divine Science page देखें।
Link: https://kalpanthealing.in/about/
🔗 Founder → Academy
Founder की आध्यात्मिक यात्रा से विकसित विभिन्न Spiritual Science, Healing, Meditation और Sadhana courses के बारे में जानने के लिए Academy देखें।
Link: https://kalpanthealing.in/academy/
🔗 Founder → Basic Healing
Healing और ऊर्जा-आधारित विभिन्न practices को समझने के लिए Basic Healing section भी देखें।
Link: https://kalpanthealing.in/basic-healing/
🔗 Founder → Advanced Healing
आध्यात्मिक और ऊर्जा-आधारित advanced practices के लिए Advanced Healing page देखें।
Link: https://kalpanthealing.in/advanced-healing/
🔗 Founder → Blog
आध्यात्मिक विज्ञान, आत्म-अन्वेषण, ध्यान और साधना से जुड़े विस्तृत लेखों के लिए हमारे Spiritual Science Blog को पढ़ें।
SWAMI JAGTESHWAR ANAND JI
Since 1997
Spiritual Guru & Consciousness Mentor
Meditation • Sadhana • Reiki • Energy Practices • Spiritual Science
Founder’s Journey Timeline
1997 → Spiritual Awakening
1998 → Healing & Yoga Practices
2012 → Kalpant Sewashram
2018–21 → Digital Spiritual Learning
Present → Spiritual Science & Consciousness Exploration